Thursday, July 30, 2026

‘डायरी के पन्नो से नाटक के मंच तक’ - मंजुल भारद्वाज

 ‘डायरी के पन्नो से नाटक के मंच तक’

- मंजुल भारद्वाज

‘डायरी के पन्नो से नाटक के मंच तक’  - मंजुल भारद्वाज


डायरी के पन्ने जब हम पलटते हैं 

फुर्सत के पलों में 

तो यकायक रोमांचित हो उठते हैं ! 


खो जाते हैं उन लम्हों में 

वक्त के पंखों पर सवार होकर 

जो अनूठे,अद्भुत और अविस्मरणीय हैं ... 


लेखन हमें तीनों काल से जोड़ता है,

बांधता है और उन्मुक्त करता है ! 


लेखन हमारी जीवन दृष्टि और दिशा को स्पष्ट करता है ...


कहने में गुरेज़ नहीं ..

लेखन जीने की प्रक्रिया है ...

या यूँ कहें जिसने लिखा नहीं वो जिया ही नहीं !


आओ अपने छोटे छोटे लम्हों को 

शब्दों में पिरोकर 

एक जीवन की लड़ी बनाएं 

और जीवन की पगडंडी को अमर बना दें ! 


जी हाँ !

संकोच,झिझक छोड़कर अपने अनकहे से रूबरू हों ... 

बरसात में खुलती परतों और टूटती हुई हदों को 

क्षतिज पर शब्द रूपी तारों सा बसा दें .. 


शब्द कागज़ की कश्ती में सवार हो 

भवसागर में समा जाएं और जीवन वैतरणी को पार करा दें !

लक्ष्य - मंजुल भारद्वाज

 लक्ष्य

 - मंजुल भारद्वाज 

लक्ष्य   - मंजुल भारद्वाज


सत्ता नहीं 

चैतन्य बोध 


सत्ता नहीं 

सत्य की खोज 


सत्ता नहीं 

सभ्यता 


आधिपत्य नहीं 

जन कल्याण !

उम्मीद का आत्मिक सौन्दर्य है चाँद ! - मंजुल भारद्वाज

 उम्मीद का आत्मिक सौन्दर्य है चाँद !

- मंजुल भारद्वाज

उम्मीद का आत्मिक सौन्दर्य है चाँद !  - मंजुल भारद्वाज


रात का हम सफ़र है चाँद 

अँधेरे में जला चॅराग है चाँद !


रात की गोद में खेलता 

हौंसला है चाँद !


पारम्परिक प्रकाश बिंब के बरक्स 

प्रतिकूल हालात में 

मन का राज़दार 

वफ़ा ऐ नूर से रोशन 

उम्मीद का आत्मिक 

सौन्दर्य है चाँद !

शिखर - मंजुल भारद्धाज

 शिखर

- मंजुल भारद्धाज


शिखर होता है रित्तत 

खालीपन से भरा हुआ

जहां साकार पिघल कर 

बहता रहता है... 

वाष्पित हो 

उड़ता रहता है...


नितांत सूनापन 

अपने को मथता रहता है... 

सृजन तरंगों के आलोक में 

आकार को निराकार करते हुए ....

शिखर - मंजुल भारद्धाज  शिखर होता है रित्तत  खालीपन से भरा हुआ जहां साकार पिघल कर  बहता रहता है...  वाष्पित हो  उड़ता रहता है...  नितांत सूनापन  अपने को मथता रहता है...  सृजन तरंगों के आलोक में  आकार को निराकार करते हुए ....  प्रदीप्त सृजन तरंग  सृजित करती हैं  चैतन्य क्षितिज और सौंदर्य बोध  जो रचते हैं रंगभूमि  आकार को निराकार करते हुए....  सृजन क्षितिज में होता है  नितांत खालीपन  प्रदीप्त सृजन तरंगों का  एकांतवास होता है  शिखर.....


प्रदीप्त सृजन तरंग 

सृजित करती हैं 

चैतन्य क्षितिज और सौंदर्य बोध 

जो रचते हैं रंगभूमि 

आकार को निराकार करते हुए....


सृजन क्षितिज में होता है 

नितांत खालीपन 

प्रदीप्त सृजन तरंगों का 

एकांतवास होता है 

शिखर.....

कवि सूर्य को साधता है - मंजुल भारद्वाज

 कवि सूर्य को साधता है

- मंजुल भारद्वाज


कवि सूर्य को साधता है 

उसे कोई फ़र्क नहीं पड़ता

कोई उसके साथ खड़ा हो 

या ना हो

वो तपता है मनुष्य रूपी 

भेड़ों को मनुष्यता का 

अहसास दिलाने के लिए !


कवि सूर्य को साधता है  - मंजुल भारद्वाज


वो चमकता रहेगा 

हर सुबह को संवारता हुआ 

कबि का लिखा 

पढ़ता है काल 

लेता है सबका हिसाब 

हर पापी, जुल्मी को फ़नाकर 

सुपुर्द-ए-खाक करता है 

इसी ज़मीन पर !


#कवि #सूर्य #मंजुलभारद्वाज

Tuesday, February 3, 2026

आम्ही आदिवासी – मंजुल भारद्वाज

 आम्ही आदिवासी
मंजुल भारद्वाज

 

आम्ही आदिवासी आदिवासी आदिवासी …

देशाचे मूळ निवासी …

आम्ही आदिवासी आदिवासी आदिवासी …

 

आम्ही जंगलात राहतो

हो … हो …

आम्ही डोंगरावर फिरतो

हो … हो …

आम्ही वाघासोबत बागडतो

हो … हो …

आम्ही निडर, बहादूर, धाडसी …

 

आम्ही आदिवासी आदिवासी आदिवासी …

देशाचे मूळ निवासी …

तुम्ही पाणी आमचा चोरता

मग चार टाळकी बसता

मग तुम्हीच कायदा काढता

आणि आमची जागा लुबाडता

आणि म्हणतात कसे

लोकशाही आहे


आम्ही आदिवासी आदिवासी आदिवासी …

देशाचे मूळ निवासी …

 

आम्ही झाडांना सांभाळतो

हो … हो …

आम्ही निसर्गाला जपतो

हो … हो …

आणि आम्हीच उपाशी मरतो

आम्ही आदिवासी आदिवासी आदिवासी

देशाचे मूळ निवासी

आणि आम्हीच मरतो उपाशी…

 

असा या देशाचा कारभार

लोकं म्हणे शिकले

शिकून लय मोठे झाले

बाजार आणलाय

शहर मोठे मोठे झाले

मोठा मोठा पगार घेतात

लाख लाख घेतात

बंगला पण बांधलाय

मोटारगाडी आणलीय

आणि ….

मोठा आजार घेतलाय

आजार बाजार व्यापार

अरे बंद करा बंद करा

जीवनाचा व्यापार बंद करा …




केला निसर्गाचा सत्यानाश

आणि याला हे म्हणतात

हा बघा विकास

 

आम्ही आदिवासी आदिवासी आदिवासी …

देशाचे मूळ निवासी …

कॉम्प्युटर आणलाय

म्हणे जग एक झालं

एक झालं म्हणजे काय हो ?

जागतिकीकरण

आणि यात आम्हा आदिवाशांचे मरण…

पर्यावरणाची बोंबाबोंब !!

 

मायेचं तापमान वाढलंय

निसर्गचक्र बिघडलंय…

 

चला जागे होऊया

चला एक होऊया

घडवूया आपलं अस्तित्व

करूया यांच्या विकासाचा

अस्त अस्त अस्त …




Sunday, September 14, 2025

अनजान डगर - मंजुल भारद्वाज

 अनजान डगर

- मंजुल भारद्वाज 

वो

कहीं भीतर 

गहराई में 

कुतरती है

अंतर्मन को  

दोराहे ,चौराहे को

छोड़ अकेले लिए 

चलती है

कभी ना ख़त्म होने वाले

एकाकी पथ पर 

जाने कहां ...

बस एक अदद 

जुनून के सिवा

ना कोई हमसफ़र 

ना मंज़िल 

बस गुब्बार ही गुब्बार 

चारों तरफ़ ...

एक अनजान यात्रा पर

चलते हुए 

बस यह गुमान है 

कि मैं चल रहा हूं 

ऐसे पथ पर 

जहां कोई नहीं चला ...

दुनिया कहीं 

पहुंचना चाहती है 

मैं कहीं नहीं 

पहुंचना चाहता

बस चलना चाहता हूं 

अनजान डगर पर ... !

अनजान डगर - मंजुल भारद्वाज  वो कहीं भीतर  गहराई में  कुतरती है अंतर्मन को   दोराहे ,चौराहे को छोड़ अकेले लिए  चलती है कभी ना ख़त्म होने वाले एकाकी पथ पर  जाने कहां ... बस एक अदद  जुनून के सिवा ना कोई हमसफ़र  ना मंज़िल  बस गुब्बार ही गुब्बार  चारों तरफ़ ... एक अनजान यात्रा पर चलते हुए  बस यह गुमान है  कि मैं चल रहा हूं  ऐसे पथ पर  जहां कोई नहीं चला ... दुनिया कहीं  पहुंचना चाहती है  मैं कहीं नहीं  पहुंचना चाहता बस चलना चाहता हूं  अनजान डगर पर ... !



‘डायरी के पन्नो से नाटक के मंच तक’ - मंजुल भारद्वाज

 ‘डायरी के पन्नो से नाटक के मंच तक’ - मंजुल भारद्वाज डायरी के पन्ने जब हम पलटते हैं  फुर्सत के पलों में  तो यकायक रोमांचित हो उठते हैं !  खो...