Sunday, August 31, 2025

घने कोहरे में ! -मंजुल भारद्वाज

 घने कोहरे में !

-मंजुल भारद्वाज


घने कोहरे में

पसीजता मन

भिगो देता है

सारे जंगल को !


मोहब्बत की निशानियाँ

चमकती हैं

डाल डाल

पत्ती पत्ती

ओस की बूंद बनकर !


महबूब के नूर से

जगमगाती है कायनात

इंसानियत का पैगाम लिए

खिलता.महकता है गुलशन

पर्वतों से गिरते झरनों में

प्रेम धुन बजाते हुए !

घने कोहरे में ! -मंजुल भारद्वाज  घने कोहरे में पसीजता मन भिगो देता है सारे जंगल को !  मोहब्बत की निशानियाँ चमकती हैं डाल डाल पत्ती पत्ती ओस की बूंद बनकर !  महबूब के नूर से जगमगाती है कायनात इंसानियत का पैगाम लिए खिलता.महकता है गुलशन पर्वतों से गिरते झरनों में प्रेम धुन बजाते हुए !



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