Sunday, September 14, 2025

अनजान डगर - मंजुल भारद्वाज

 अनजान डगर

- मंजुल भारद्वाज 

वो

कहीं भीतर 

गहराई में 

कुतरती है

अंतर्मन को  

दोराहे ,चौराहे को

छोड़ अकेले लिए 

चलती है

कभी ना ख़त्म होने वाले

एकाकी पथ पर 

जाने कहां ...

बस एक अदद 

जुनून के सिवा

ना कोई हमसफ़र 

ना मंज़िल 

बस गुब्बार ही गुब्बार 

चारों तरफ़ ...

एक अनजान यात्रा पर

चलते हुए 

बस यह गुमान है 

कि मैं चल रहा हूं 

ऐसे पथ पर 

जहां कोई नहीं चला ...

दुनिया कहीं 

पहुंचना चाहती है 

मैं कहीं नहीं 

पहुंचना चाहता

बस चलना चाहता हूं 

अनजान डगर पर ... !

अनजान डगर - मंजुल भारद्वाज  वो कहीं भीतर  गहराई में  कुतरती है अंतर्मन को   दोराहे ,चौराहे को छोड़ अकेले लिए  चलती है कभी ना ख़त्म होने वाले एकाकी पथ पर  जाने कहां ... बस एक अदद  जुनून के सिवा ना कोई हमसफ़र  ना मंज़िल  बस गुब्बार ही गुब्बार  चारों तरफ़ ... एक अनजान यात्रा पर चलते हुए  बस यह गुमान है  कि मैं चल रहा हूं  ऐसे पथ पर  जहां कोई नहीं चला ... दुनिया कहीं  पहुंचना चाहती है  मैं कहीं नहीं  पहुंचना चाहता बस चलना चाहता हूं  अनजान डगर पर ... !



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