Friday, September 5, 2025

ख़्वाब अक़्ल के पेड़ पर उगते हैं ! - मंजुल भारद्वाज

 ख़्वाब अक़्ल के पेड़ पर उगते हैं ! 

- मंजुल भारद्वाज

ख़्वाब अक़्ल के पेड़ पर उगते हैं ! - मंजुल भारद्वाज





व्यवहार और प्रमाण के बिना

सपनों का क्या वजूद है?

सपना एक कल्पना लोक

व्यवहार और प्रमाण उसके

साकार होने के दस्तावेज़!

अक्सर भाव भटकाव की

भुलभुलैया में भटकते हैं 

भाव के भटकाव को

शायर,कवि खूब भुनाते हैं!

बानगी देखिए 

तेरे से कोई शिकवा भी नहीं

और तेरे बिना ज़िंदगी 

ज़िंदगी भी नहीं !

ऐसे शायर को समाज 

बड़ा संजीदा मानता है 

उनकी संजीदगी को पूजता है 

पर सवाल नहीं करता कि

हे भटकाव के व्यापारी

तुम क्यों भाव भटकाव की

भुलभुलैया में ज़िंदगी को फंसा देते हो ?

दरअसल समाज का कोई स्टैंड नहीं होता

समाज बेपेंदे का लौटा होता है 

वो व्यक्ति,परिस्थिति देख

अपना रंग यानी स्टैंड बदलता है!

बचपन नवांकुर है जीवन का

समय के साथ अंकुर 

आकार लेता है 

बचपन के ख़्वाब 

ख्वाहिशें , सपने, समाज 

परिवार और मित्रों के प्रभाव 

और नकल होते हैं!

मुझे ऐसा बनना है 

मेरा यह सपना है 

असल में वो जीवन में 

पेट को भरने के कार्य होते हैं 

पर क्या पेट भरने के कार्य ही 

सपने हैं?

इसका एक नमूना

मुझे डॉक्टर क्यों बनाना है?

मुझे सेना में क्यों जाना है?

मुझे कलाकार क्यों बनना है?

मुझे शिक्षक क्यों बनना है?

जवाब वही 

ढाक के तीन पात !

सपना , ख़्वाब दरअसल 

भाव के लड़कपन को छोड़ 

अक़्ल के पेड़ पर उगते हैं 

और जो अक़्ल के 

पेड़ पर उगते हैं 

वहीं ख़्वाब होते हैं 

क्योंकि उनकी जड़ें 

भाव के गुब्बारे में नहीं

ज़मीन के अंदर गड़ी होती हैं!

अक़्ल के पेड़ पर उगे ख़्वाब 

पूरे होते हैं 

वो अफ़सोस के नासूर नहीं

ज़िंदगी को शांति

समग्रता से सराबोर कर

इतिहास में प्रेरणा बनकर जीते हैं।

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