रात भर
- मंजुल भारद्वाज
लब सुलगते रहे
शबनम गिरती रही
रात भर !
इठला इठला कर चांद
इतराता रहा
आंखों में नींद
जलती रही
रात भर !
तेरे आंचल के सितारे
जगमगाते रहे
मेरी चाहत के
कोरे पन्ने
फड़फड़ाते रहे
रात भर !
परवाने उड़ते रहे
चरागों में जलते रहे
मन्द मन्द सांसों की
ताल पर
तन्हाई नाचती रही
रात भर !
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