Sunday, September 14, 2025

अनजान डगर - मंजुल भारद्वाज

 अनजान डगर

- मंजुल भारद्वाज 

वो

कहीं भीतर 

गहराई में 

कुतरती है

अंतर्मन को  

दोराहे ,चौराहे को

छोड़ अकेले लिए 

चलती है

कभी ना ख़त्म होने वाले

एकाकी पथ पर 

जाने कहां ...

बस एक अदद 

जुनून के सिवा

ना कोई हमसफ़र 

ना मंज़िल 

बस गुब्बार ही गुब्बार 

चारों तरफ़ ...

एक अनजान यात्रा पर

चलते हुए 

बस यह गुमान है 

कि मैं चल रहा हूं 

ऐसे पथ पर 

जहां कोई नहीं चला ...

दुनिया कहीं 

पहुंचना चाहती है 

मैं कहीं नहीं 

पहुंचना चाहता

बस चलना चाहता हूं 

अनजान डगर पर ... !

अनजान डगर - मंजुल भारद्वाज  वो कहीं भीतर  गहराई में  कुतरती है अंतर्मन को   दोराहे ,चौराहे को छोड़ अकेले लिए  चलती है कभी ना ख़त्म होने वाले एकाकी पथ पर  जाने कहां ... बस एक अदद  जुनून के सिवा ना कोई हमसफ़र  ना मंज़िल  बस गुब्बार ही गुब्बार  चारों तरफ़ ... एक अनजान यात्रा पर चलते हुए  बस यह गुमान है  कि मैं चल रहा हूं  ऐसे पथ पर  जहां कोई नहीं चला ... दुनिया कहीं  पहुंचना चाहती है  मैं कहीं नहीं  पहुंचना चाहता बस चलना चाहता हूं  अनजान डगर पर ... !



Wednesday, September 10, 2025

नियामत - मंजुल भारद्वाज

  नियामत

- मंजुल भारद्वाज

तुम्हारी आंखें 

अफ़साना लिखती हैं

मौन रह कर

हमेशा बोलती हैं !

तुम कुदरत की 

इनायत हो

तुम्हारी मुस्कराहट

एक इबादत है !

तुम्हारे लबों पर 

तैरती दुआ

फ़िज़ा में गूंजता 

मोहब्बत का नग़मा है !

तुम

बंदगी का कलमा

आशिकों की फ़रियाद

ज़िंदगी की 

नियामत हो!

#आंखें #नियामत #मंजुलभारद्वाज

Sunday, September 7, 2025

रात भर - मंजुल भारद्वाज

  रात भर

- मंजुल भारद्वाज

लब सुलगते रहे

शबनम गिरती रही

रात भर !

इठला इठला  कर  चांद

इतराता रहा

आंखों में नींद

जलती रही 

रात भर !

तेरे आंचल के सितारे 

जगमगाते रहे

मेरी चाहत के 

कोरे पन्ने

फड़फड़ाते रहे

रात भर !

परवाने उड़ते रहे

चरागों में जलते रहे

मन्द मन्द सांसों की

ताल पर

तन्हाई नाचती रही

रात भर !

रात भर - मंजुल भारद्वाज लब सुलगते रहे शबनम गिरती रही रात भर ! इठला इठला  कर  चांद इतराता रहा आंखों में नींद जलती रही  रात भर ! तेरे आंचल के सितारे  जगमगाते रहे मेरी चाहत के  कोरे पन्ने फड़फड़ाते रहे रात भर ! परवाने उड़ते रहे चरागों में जलते रहे मन्द मन्द सांसों की ताल पर तन्हाई नाचती रही रात भर ! #रातभर #मंजुलभारद्वाज https://www.torfoundationindia.org/

#रातभर #मंजुलभारद्वाज

Friday, September 5, 2025

ख़्वाब अक़्ल के पेड़ पर उगते हैं ! - मंजुल भारद्वाज

 ख़्वाब अक़्ल के पेड़ पर उगते हैं ! 

- मंजुल भारद्वाज

ख़्वाब अक़्ल के पेड़ पर उगते हैं ! - मंजुल भारद्वाज





व्यवहार और प्रमाण के बिना

सपनों का क्या वजूद है?

सपना एक कल्पना लोक

व्यवहार और प्रमाण उसके

साकार होने के दस्तावेज़!

अक्सर भाव भटकाव की

भुलभुलैया में भटकते हैं 

भाव के भटकाव को

शायर,कवि खूब भुनाते हैं!

बानगी देखिए 

तेरे से कोई शिकवा भी नहीं

और तेरे बिना ज़िंदगी 

ज़िंदगी भी नहीं !

ऐसे शायर को समाज 

बड़ा संजीदा मानता है 

उनकी संजीदगी को पूजता है 

पर सवाल नहीं करता कि

हे भटकाव के व्यापारी

तुम क्यों भाव भटकाव की

भुलभुलैया में ज़िंदगी को फंसा देते हो ?

दरअसल समाज का कोई स्टैंड नहीं होता

समाज बेपेंदे का लौटा होता है 

वो व्यक्ति,परिस्थिति देख

अपना रंग यानी स्टैंड बदलता है!

बचपन नवांकुर है जीवन का

समय के साथ अंकुर 

आकार लेता है 

बचपन के ख़्वाब 

ख्वाहिशें , सपने, समाज 

परिवार और मित्रों के प्रभाव 

और नकल होते हैं!

मुझे ऐसा बनना है 

मेरा यह सपना है 

असल में वो जीवन में 

पेट को भरने के कार्य होते हैं 

पर क्या पेट भरने के कार्य ही 

सपने हैं?

इसका एक नमूना

मुझे डॉक्टर क्यों बनाना है?

मुझे सेना में क्यों जाना है?

मुझे कलाकार क्यों बनना है?

मुझे शिक्षक क्यों बनना है?

जवाब वही 

ढाक के तीन पात !

सपना , ख़्वाब दरअसल 

भाव के लड़कपन को छोड़ 

अक़्ल के पेड़ पर उगते हैं 

और जो अक़्ल के 

पेड़ पर उगते हैं 

वहीं ख़्वाब होते हैं 

क्योंकि उनकी जड़ें 

भाव के गुब्बारे में नहीं

ज़मीन के अंदर गड़ी होती हैं!

अक़्ल के पेड़ पर उगे ख़्वाब 

पूरे होते हैं 

वो अफ़सोस के नासूर नहीं

ज़िंदगी को शांति

समग्रता से सराबोर कर

इतिहास में प्रेरणा बनकर जीते हैं।

आम्ही आदिवासी – मंजुल भारद्वाज

  आम्ही आदिवासी – मंजुल भारद्वाज   आम्ही आदिवासी आदिवासी आदिवासी … देशाचे मूळ निवासी … आम्ही आदिवासी आदिवासी आदिवासी …   आम्ही ज...