शिखर
- मंजुल भारद्धाज
शिखर होता है रित्तत
खालीपन से भरा हुआ
जहां साकार पिघल कर
बहता रहता है...
वाष्पित हो
उड़ता रहता है...
नितांत सूनापन
अपने को मथता रहता है...
सृजन तरंगों के आलोक में
आकार को निराकार करते हुए ....
प्रदीप्त सृजन तरंग
सृजित करती हैं
चैतन्य क्षितिज और सौंदर्य बोध
जो रचते हैं रंगभूमि
आकार को निराकार करते हुए....
सृजन क्षितिज में होता है
नितांत खालीपन
प्रदीप्त सृजन तरंगों का
एकांतवास होता है
शिखर.....

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