स्पंदन
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आम्ही आदिवासी – मंजुल भारद्वाज
आम्ही आदिवासी – मंजुल भारद्वाज आम्ही आदिवासी आदिवासी आदिवासी … देशाचे मूळ निवासी … आम्ही आदिवासी आदिवासी आदिवासी … आम्ही ज...
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आज़ादी की पुकार है ! -मंजुल भारद्वाज हे आज़ादी के पैरोकार अब हथकड़ियों का श्रृंगार करो ! सच बोलने वालो ज़हर पीने के लिए रहो तैयार ! संविधान ...
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घने कोहरे में ! -मंजुल भारद्वाज घने कोहरे में पसीजता मन भिगो देता है सारे जंगल को ! मोहब्बत की निशानियाँ चमकती हैं डाल डाल पत्ती पत्ती ओस ...
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एक अनन्त खोज है ... -मंजुल भारद्वाज कल्पना और बुद्धि का इंसानी स्वरूप है कला कल्पना जड़ता को तोड़ती है बन्धनों को खोलती है मौत क...


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