उगा था वो अंतर्मन में
- मंजुल भारद्वाज
उगा था वो अंतर्मन में
अपने होने की खुशबू से
मैं उसके वजूद को महका आया
अपने अहसास की तरंगों से
मैं सदा सदा के लिए
उसको रंग आया !
‘डायरी के पन्नो से नाटक के मंच तक’ - मंजुल भारद्वाज डायरी के पन्ने जब हम पलटते हैं फुर्सत के पलों में तो यकायक रोमांचित हो उठते हैं ! खो...
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