मंडी को ‘हाउस’ बनाता चायवाला !
- मंजुल भारद्वाज
सत्तापीठ की गोद में
कला,संस्कृति,साहित्य और रंगकर्म से
जनसरोकारों को गायब करने
सत्ता का जयकारा लगाने
दरबारी भीड़ को प्रशिक्षित
पुरस्कृत और प्रचारित करने के लिए
सरकार ने एक चौराहा स्थापित किया है
जहाँ हर रोज़ भीड़ लगती है
गाँव,देहात,तहसील
जिलों,बस्तियों,कस्बो,
शहरों और राज्यों से आए युवाओं की
सपनों से सराबोर यह युवा
खाक़ छानते हैं इस चौराहे की
‘सितारे’ बनने की उम्मीद में
सत्ता के मृगजाल में फंसकर
अपने सपनों को स्वयं लीलते हैं
अवतरित होते हैं सत्ता के दलाल बनकर
सत्य,निष्ठा,प्रतिबद्दता प्रतिरूपित होती है
अवसाद,अवसरवाद और भीतरघात लिए
सत्तापीठ की गोद में बैठा यह चौराहा
जनसरोकारों का गला घोट रहा है
सरकार की जवादेही पर पर्दा गिरा रहा है
सरकार पोषित,प्रदूषित ‘कला पाखंडों’ से
बस सांस चलती है तो नवआगंतुक युवाओं से
नाउम्मीदी के इस भीषण अंधकार को
रौशन करता है एक ‘चायवाला’
उम्मीदों, सपनों,उमंगों के बनने और मिटने के
जाने कितने ही राज़,रहस्य और उधारी
रखता है अपने सीने में दफ़न
यह चायवाला
सत्ता की कठपुतलियों के पाखंडों,
कुकर्मों से बेजार है मंडी
उसे रौशन कर हाउस बनाता है चायवाला
अपने पथ पर अटल, अडिग
कितने बुझते सपनों को जगाता है
मंडी को ‘हाउस’ बनाता है, यह चायवाला
फुटपाथ से सत्तापीठ को जीवन दर्शन
सिखाता है यह चायवाला
उम्मीद जीवन है उसे मत छोड़ो
यह फुटपाथ जनमंच है
अपने सरोकारों को अभिव्यक्त करो
सरकारी षड्यंत्रों का पर्दाफ़ाश करो
यहीं से खुलता है विद्रोह का मार्ग
यहीं बनती हैं सत्ता के बनने और बिगड़ने की युक्तियाँ
फुटपाथ की धूल से बनते हैं ‘सितारे’
जो बदलते हैं सत्ता के नक्षत्र!
ऐ चायवाले, ऐ मेरे राज़दार
मेरी तपस्या के साक्षी
तुझे सलाम!
पर सावधान मेरे भाई
आज तेरी निष्ठा और पहचान पर ग्रहण लगा है
एक आदमखोर ‘चायवाले’ का भेष धर
सत्ता के शीर्ष पर जा बैठा है
देश को मंडी बना
बेचने पर तुला है
इसलिए अपनी ‘पहचान’ बचा
मेरे भाई चायवाले
तुझे सलाम!
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