अपनी प्रकृति बदलने की ज़रूरत है!
-मंजुल भारद्वाज
मेरे हमदर्द
मैंने देखी है
वो खौफ़नाक बरसात
किसी चूल्हे की आग़ बुझाती
किसी झोपड़ी को बहा ले जाती
खड़ी फ़सल को उजाड़
कटी फ़सल को सड़ा
उपज को बर्बाद करती हुई
वो खौफ़नाक बरसात
जिसके शोर में ना जाने
कितनी ही अस्मिताओं के
लूटने की चीखें दफ़न हैं
कितने ही अरमानों का
कितने ही दिलों के टूटने का
कितने ही नासूरों का
अपराध दर्ज़ है
मेरे हमदर्द
मैंने देखी है
वो खौफ़नाक बरसात
तूफ़ान का आवेग लिए
घरों को डूबाती
नदियों के किनारे
उनकी शालीनता,मर्यादा तोड़
बाढ़ की प्रलय लिए
वो खौफ़नाक बरसात
पर मेरे हमदर्द
बरसात खौफ़नाक है या मनुष्य
कुदरत या मानव निर्मित व्यवस्था
लालच,शोषण,हिंसा
प्रकृति पर काबू पा
स्वयंभू होने की
मनुष्य की दंभी सोच
विज्ञान को विध्वंश में
बदलने की हैवानी सोच
विकास के भूखे भेड़ियों की
जंगलों को ध्वस्त कर
पेड़ों के वस्त्रों से ढकी ज़मीन के
एक एक टुकड़े को नोचने की
आत्मघाती प्रवृति
हरा भरा आंचल तार तार कर
देश में मौत का तांडव
हाईवे यानी यमराज मार्ग
बनाने का षड्यंत्र
मेरे हमदर्द
प्रकृति सम है
उसके लिए जन्म और मौत
एक है
मौसम मुद्दा नहीं है
असल मुद्दा है
हमारा नज़रिया
मनुष्य को प्रकृति से
समन्वय,सौहार्द और शान्ति के लिए
मेरे हमदर्द
अपनी प्रकृति बदलने की ज़रूरत है
मौसम नहीं !
...
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