सोच का ‘शौच’ सच
-मंजुल भारद्वाज
विगत 5 सालों से शौचालयों की
सड़क से संसद तक बहुत चर्चा है
देश में शौचालयों का निर्माण
एक सूत्री कार्यक्रम है
शौचालय देश में महिलाओं की
अस्मिता बचाने का राष्ट्र संकल्प है
राष्ट्रवाद से उफनते राष्ट्र ने
कर्मठ शौचालयों के निर्माता को
पूर्ण बहुमत से दोबारा चुना
संविधान सम्मत EVM से
पर कुदरत का रंग अलग है
देश की आर्थिक राजधानी
मुंबई की बरसात अलग है
बीते तीन दिन की बरसात ने
शौचालयों का विकराल रूप
मुम्बईकरों को दिखा दिया
घर सबका प्यारा सपना होता है
झोंपड़ी हो या महल
घर एक सोच है
सोच यानी विचार
विचार की अभिव्यक्ति
जीवन को सुंदर बनाती है
विचार अवरुद्ध हो तो
कुंठा,क्लेश,विध्वंस अटल हैं
और शौचालय का निकास रुक जाएँ तो?
आपका सुंदर घर
आपके ही शौचालय की गंदगी से
भर जाता है
गटर का गंदा पानी
आपके घर को भर देता है
आपका विकास दुर्गन्ध से
भर जाता है
विकास ने कुदरत को
मटियामेट करने की ठान ली है
कुदरत का नियम है
आवक और जावक
पर विकास को सिर्फ़ आवक दिखता है
निकास की उसे चिंता नहीं
कॉर्पोरेटर,विधायक और सांसद
चुनने के बावजूद शौचालयों के
निकास मार्ग को दुरुस्त नहीं कर पाई
शौचालयों की कर्मठ सरकार
जनता विकास में अंधी है
कुदरत की प्रवाह नहीं करती
बरसात तो होती है
समंदर में हाई टाइड है
जनता खुद को समझा लेगी
एक रात के नरक को सह लेगी
क्रिकेट टीम मैच जीत
रात का दुःख हर लेगी
सोच का ‘शौच’ सच
चीखता रहेगा
प्रकृति को लीलते हुए
घर घर..हर हर
विकास का जयकारा
लगता रहेगा...
...
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