जब एक छोर दूसरे से मिलता है!
-मंजुल भारद्वाज
जीवन का भाव विश्व गहरा
निज होते हुए व्यापक और समग्र हो
वसुंधरा के गुरुत्वाकर्षण की मानिंद
विचार की ऊंचाई
ब्रह्मांडीय चैतन्य से जुड़ी हो
जो टेड़े चलते मनुष्य को
सीधी दृष्टि से इंसान बनाए
व्यक्तित्व का गरिमामय सौन्दर्य
कलात्मक बोध से परिपूर्ण हो
जो जीवन की चुनौतियों के
संघर्ष में उत्पन्न विष को पी सके
एक बेहतर विश्व के लिए
दरअसल जीवन
गुरुत्वाकर्षण से शुरू होता है
और गुरुत्वाकर्षण के परे
अनन्त अन्तरिक्ष में विलीन हो जाता है
एक चक्र से छोर को
दूसरे छोर से मिलाता हुआ !
....
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