Tuesday, November 5, 2019

यही सृष्टि भेद! -मंजुल भारद्वाज

यही सृष्टि भेद!
-मंजुल भारद्वाज
बाहर जग सारा ढूंढे
मन के भीतर बसे प्रीत
भेद बस जरा सा
समझ ना पाए रीत

बाहर सब अँधियारा
मन के गहरे पैठ उजियारा
दिन रात के फ़ेर में
सब खोवन की रीत

तन रंग सुंदर भयो
बदलो बाणी और भेष
मन मैला रख छोड़
कहाँ मिले मनमीत

धागा प्रेम तब जुडत है
जहाँ मन बसे प्रीत
भेद बस जरा सा
समझ ना पाए रीत

जीया का ठौर
है पिया घर
प्रेम दीये से
होत है रोशन
जीवन,घर,संसार

जग बौराया बाहर ढूंढे
जीवन का सुख चैन
ढूंढत ढूंढत दिवस गवाए
रहे दुखी बैचेन
भीतर तृप्ति सोवत रहे
लेकर गहरी नींद

जिसने भीतर झाँका
पाया सत का द्वार
पत्थर भीतर आग बसे
मिट्टी में तत्व
आसमान में तरंगित हैं
हवा पानी प्राण
मैं से मैं सृजित हूँ
यही सृष्टि भेद!
...
#सृष्टि #भेद #मंजुलभारद्वाज

No comments:

Post a Comment

आम्ही आदिवासी – मंजुल भारद्वाज

  आम्ही आदिवासी – मंजुल भारद्वाज   आम्ही आदिवासी आदिवासी आदिवासी … देशाचे मूळ निवासी … आम्ही आदिवासी आदिवासी आदिवासी …   आम्ही ज...