चुनाव में पैसा क्यों?
-मंजुल भारद्वाज
चुनाव में पैसा क्यों?
मतदान है या मतों की बोली
नीति का निर्णय या पैसों की होली
चुनाव में पैसा क्यों?
चुनाव में भव्य रैलियाँ क्यों?
बड़े नेताओं का सुरक्षा खर्च क्यों?
संवैधानिक पद पर रहे
अपनी पार्टी का प्रचार करे
तो सरकारी खर्च क्यों?
चुनाव में पैसा क्यों?
क्या ये पैसा जनता का है?
क्या ये पैसा नेता का है?
क्या ये पैसा पूंजीपतियों का है?
अगर ये पैसा पूंजीपतियों का है
तो पूंजीपति क्यों पैसा लगाता है?
क्या ये लोकतंत्र पूंजी द्वारा स्थापित
पूंजीपतियों के लिए है
और ये लोकतंत्र पूंजी द्वारा स्थापित
पूंजीपतियों के लिए है
तो फिर जनता क्यों मतदान करती है?
क्या जनता सिर्फ़ पूंजीपतियों की कठपुतली है?
या जनता ये मानती है
ये लोकतंत्र उसका नहीं है
कब तक पूंजी की मंडी में
चुनाव बिकता रहेगा?
पूंजी की चकाचौंध में
काले कारनामे ढके रहेगें
कब तक जनता और नेता लुटते रहेंगें?
इतनी सरल बात समझ
क्यों नहीं आती
वोट जनता को देना है
वोट नेता को लेना है
यह संवैधानिक जिम्मेदारी है
इसमें पूंजी की क्यों सेंधमारी है?
जितना चुनाव में पूंजी का बोलबाला
सरकार में उतना बड़ा घोटाला
लोकतंत्र को बचाना है
चुनाव से पूंजी को हटाना है!
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