मृतप्राय
- मंजुल भारद्वाज
पृथ्वी ..अंडाकार है ..
एक तरह से गोल है
अभी तक ब्रह्मांड के
शोध से जो चित्र
अनुमानित हुआ है
वो भी गोल है
यानी एक चक्र है
सब अपने दायित्व
ज़िम्मेदारी , कर्तव्य
जवाबदारी के पथ
यानी दृष्टि के दायरे में
बंधे हैं और चक्र के
दायरे में गोल गोल घूम रहे हैं
इस गोल गोल घूमने को
जीवन कहतें है यानी यात्रा
जिसकी जितनी विशाल दृष्टि
उसकी उतनी चैतन्य सृष्टि
उसका उतना बड़ा दायरा
गुरुत्वाकर्षण से शुरू होकर
गुरुत्व विहीन यानी उन्मुक्त
अब संसार यानी गुरुत्वाकर्षण
से संचालित जीवन
ब्रह्माण्ड गुरुत्व विहीन उन्मुक्त
वैराग्य जिसमें जीता है सारा विश्व
अपने समय और नियमानुसार
अब ये हमें तय करना है
कौनसा जीवन जीना है
आप अपने आप को सार्थक
मान सकते हो क्योंकि आपके
पास चुनने का विकल्प है
बाकि देह प्राण होते हुए
मृतप्राय हैं ...!
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