Wednesday, November 6, 2019

जी,मैं जिंदगी पढता हूँ ! - मंजुल भारद्वाज

जी,मैं जिंदगी पढता हूँ!
-मंजुल भारद्वाज
किस्सा नब्बे के दशक का है
एक विशिष्ट वाद की पुस्तक
गौरव,मान और प्रतिष्ठा
प्रगतिशीलता का पैमाना थी
एक दिन उसवाद पर खड़ा
साम्राज्य ढह गया
विशिष्ट वाद की पुस्तकों का ढेर
मुंबई के फूटपाथ पर लग गया
रद्दी में किलो के भाव बिकने के लिए
मन टूटा,
यह घटना व्यक्तिगत सदमा थी
क्या वाद तब तक प्रगतिशील है
जब तक सत्ता है
क्या पुस्तक का सम्मान तब तक है
जब तक सत्ता है
पुस्तक ने कहा
मैं किसी ओर का ज्ञान हूँ
जो तुम्हारे लिए एक सूचना भर है
उस पर आप शोध कर सकते हैं
परीक्षा पास कर नौकरी पा सकते हैं
आलोचक बन सकते हैं
पुस्तक का सन्दर्भ देकर
किसी को डरा सकते हैं
मजाक उड़ा सकते हैं
पुस्तक के सूत्रों से सत्ता
स्थापित कर सकते हैं
टिका नहीं सकते
क्योंकि उसके लिए
नए सृजन की अनिवार्यता होती है
सृजन के लिए ज्ञान अर्जन अनिवार्य है
ज्ञान अर्जन करना है तो
जिंदगी पढ़ो,
पुस्तक अपने आप बन जायेगी
जी,मैं जिंदगी पढता हूँ!
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