पलायन
-मंजुल भारद्वाज
वो ताकता पहाड़
आग उगलता सूर्य
किसान की बेटी
बकरियों का झुण्ड
दीपकनुमा रौशनी में नहाये
पहाड़ की गोदी में लटके घर ।
जीवन की कठोरता , विवशता में अभिशप्त
अंधविश्वासों,भूतप्रेतों देवी देवताओं
कुरीतियों , कुप्रथाओं , बुरी आदतों से
ओत प्रोत , भ्रमित जन मानस ।
कुदरती संसाधनों , जल स्त्रोंतों ,
प्रपातों का कुप्रबंधन
कबीलाई संस्कृति का पुरातनपंथ ।
जलते चूल्हों से उड़ाती राख
आग में उड़ते पतंगें
नाज़ुक हाथों से पकती रोटियाँ ।
कंकालनुमा , धुंएँ से पुते ,
अपने शैशव , यौवन काल पर
शोकाकुल घर ।
अपनी जड़ों से पलायन करते ,
अनजान शहरी सपनो में खोये युवामन ।
अपनी हथेली पर खेती का गुलदस्ता लिए
निहारती , पुकारती किसी विरहन सी वादियाँ ।
…………….
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