चैतन्य अभ्यास
-मंजुल भारद्वाज
चैतन्य अभ्यास करता है
मुझे निराकार
निसर्ग का स्पर्श,स्पंदन
व्यवहार की जड़ता को तोड़
तत्व से करता है एकनिष्ठ
कोई आकार नहीं ठहरता
काल के समक्ष
काल को वही साध पाता है
जो काल के परे है
निरंतर,निराकार है
काल को मथते हुए
बदलते पहर में
समय मेरे ऊँगली पकड़कर चलता है
मेरे साथ सृजन साधना के लिए
सूर्य,चन्द्र,हवा,पानी
आसमान और वसुंधरा
एकाकार होते हैं मुझमें
काल के परे काल को गढ़ने के लिए!
...
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