मेरा होना विलक्षण है
-मंजुल भारद्वाज
मेरा होना विलक्षण है
मैं स्वप्नलोक में रहता हूँ
खुली आँखों से सपने देखता हूँ
पूरे होने का आनंद लेता हूँ
आनंदित होकर फिर सपने देखता हूँ
दरअसल मैं जुनून हूँ
असंभव के अ को साधने वाला
सम्भव हूँ मैं
पेट के बल रेंगते हुए समाज के समक्ष
बुद्धि,विवेक और इंसानी भाव से लबरेज़
जीवन का पथिक हूँ मैं
शरीर में खपने की बजाए
शरीर को मानवता के लिए
खपानेवाला प्राणायाम हूँ मैं
माउन्ट अवेरेस्ट को फतह करने वाली उर्जा
महासागर की तलहटी में बहता हुआ
मीठे पानी का धारा हूँ
आसमान में गर्जता विधुतीय आवेग
धरती पर बहती शीतल बयार हूँ
पृथ्वी के गर्भ में खदकता लावा
वसुंधरा का प्राण हूँ मैं
अमूर्त..मूर्त ..अमूर्त की
क्रिया,प्रकिया में प्रतिबद्ध
कलाकार हूँ मैं
मेरा होना विलक्षण है!
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