Thursday, November 7, 2019

दहशत के वज़ीर निकले! - मंजुल भारद्वाज

दहशत के वज़ीर निकले!
- मंजुल भारद्वाज
तुम मोहब्बत के फ़रिश्ते नहीं
दहशत के वज़ीर निकले
बुद्ध,गांधी की भूमि के बासिन्दे नहीं
अमन से खौफज़दा दरिन्दे निकले
देश के दुश्मन चंद कीड़े मकौड़ों को मसलना था
तुमने पूरे चमन को फूंक डाला
दरअसल विध्वंस तुम्हारी फ़ितरत है
तुमने नोट बंदी के तुगलकी फरमान से जान लिया था
मुर्दा समाज के तुम इकलौते बादशाह हो
प्रतिकार शून्य,विचार शून्य,विवेकहीन समाज को
कैसे हांका जाता है तुम जानते हो
तुम चाटुकार अफसरशाही को साधना जानते हो
दुश्मन चाहता था
तुम दमन करो
लोकतंत्र की आत्मा संविधान को रौंद दो
दुश्मन के जाल में
तुम ऐसे उलझे
तुम अपने ही देश के दुश्मन हो गये
दुश्मन तुम्हारा मुफीद निकला
वो तुम्हारा यार निकला
जहर उगलते मीडिया के जयकारे में मस्त
लाशों पर राज करने वाले तानाशाह
बंदूक की नोंक पर स्वाभिमान नहीं रौंदा जाता
बस खून की होली खेली जाती है!
...
#अमन #मोहब्बत #मंजुलभारद्वाज

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