Tuesday, November 5, 2019

आपली मुंबई! -मंजुल भारद्वाज

आपली मुंबई!
-मंजुल भारद्वाज
आपली मुंबई
नारों के शोर में खो गई
भीड़ में खो गई
भीड़ हो गई
इंसानियत का मखौल उड़ाती
अट्टालिकाओं के बोझ तले दब गई
वाडा,वाडी,चाल को छोड़
मुम्बई विलुप्त हो गई
बड़े आए थे मुम्बई को
बचाने वाले मुम्बई के लाल
पैसा देखकर सब हो गए दलाल
पैसे वालों के हाथ मुंबई बिक गई
मुंबई की मेहनतकश फ़िज़ा
अब लूट की आबोहवा हो गई
हया हो हया,साथी हाथ बढ़ाना
अबे ओए,हाथ हटा में बदल गई
देश के सपने जिसकी रंगों में धड़कते थे
वो अब सपनों की लूटेरी हो गई
आह वो भूमि जहाँ
‘अंग्रेजो भारत छोड़ो’ का इंकलाब गूंजा था
अब पूंजीपतियों की गुलाम हो गई
मिल जिसकी धडकन थी
मजदूर जिसका प्राण
अब वो लहूलुहान हो गई
मिलों की उस ज़मीन पर
जहाँ जिन्दा थी हजारों ख्वाहिशें
आज कांच की गगनचुंबी इमारत हो गई
इन कांच की गगनचुंबी
इमारतों में मुबई खो गई
विविधता की जननी
आज निजी सम्पत्ति हो गई
कितना भद्दा है भूमंडलीकरण का विकास
मुंबई की उन्मुक्त हवाएं
कांच की इमारतों में क़ैद हो गई
क्या मूल निवासियों का विस्थापन विकास है?
क्या गरीब का विस्थापन विकास है?
क्या नैसर्गिक संसाधनों का विनाश
विकास है?
क्या लाखों मजदूरों,गरीबों को तबाह कर
मुंबई को संघाई बनाना विकास है?
मुंबई का एक एक इंच
समंदर का किनारा
विकास की लालच का बलि है
क्या विकास की आहुति में
मुम्बई स्वाह हो गई?
तुम जिसके श्रम पर जिंदा हो
उसका हक्क छीन लो
उसका घर छीन लो
उसका जीवन छीन लो
उसे हद्द पार कर दो
उसके बाद कहो विकास
ऐ विकास के पुरोधाओ
क्या तुम जिंदा हो?
या ज़मीर बेच चुके
इंसानियत के व्यापारी?
इंसानियत की पैरोकार
अधिकारों के लिए लड़ने वाली
सर्वहारा संघर्ष संस्कृति
आपली मुम्बई कहाँ खो गई?
...
#आपलीमुंबई #मुंबई #मंजुलभारद्वाज

No comments:

Post a Comment

आम्ही आदिवासी – मंजुल भारद्वाज

  आम्ही आदिवासी – मंजुल भारद्वाज   आम्ही आदिवासी आदिवासी आदिवासी … देशाचे मूळ निवासी … आम्ही आदिवासी आदिवासी आदिवासी …   आम्ही ज...