सहज बोध की स्वच्छंदता
-मंजुल भारद्वाज
यूं आती है,कौंध जाती है
सोते जागते
उठते बैठते
किसी भी अवस्था में
कहीं भी,कैसे भी
ना घड़ी ना पहर
ना दर ना दरीचा
किसी से नहीं रूकती
बस आती है
झकझोर जाती है
जैसे बादलों में चमकती बिजली
रात के अँधेरे में जुगनू
अँधेरी गुफ़ा में एक छोटा सा
रौशनी का सुराग
किसी महबूबा सी विरह में
बसंत खिला जाती है
उसका एक झटका
वक्त बदला देता है
सदियों का फ़ेर बदल जाता है
कहाँ से आती है
कहाँ चली जाती है
अजब रहस्य है
पर जीवन रहस्यों को
खोलने की चाबी थमा जाती है
अलग थलग पड़े व्यक्ति को
पूरे ब्रह्माण्ड की तरंगों से जोड़ जाती है
चेतन,अर्ध चेतन,अवचेतन में बसती है
वो ना सोती,ना जागती है
निरंतर अपनी यात्रा में है
खोज,शोध,सृजन तपस्वियों से
सहज अपने आप जुड़ जाती है
उसे सहज बोध की स्वच्छंदता कहूँ
या कहूँ प्रेरणा या उत्प्रेरणा
हताश को आस
बेरंग में रंग
पथराई आखों में सुकून
सूखी आखों में सपनों की
बारिश कर जाती है
उदास जीवन में उमंग
दिल में प्रीत
मोहब्बत के पैग़ाम
अरमानो पर लिख
हवाओं में रूमानियत
बिखेर जाती है
जी हाँ आजकल की भाषा में
दिमाग की बत्ती जला जाती है!
...
#सहजबोध #मंजुलभारद्वाज
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