बकरी चराती आदिवासी बुढ़िया
-मंजुल भारद्वाज
क्या अंतर है
मुम्बई के निकट
आदिवासी गाँव में
बकरी चराती एक बुढिया
और
विवाह परम्परा में दान कर दी गई
मुंबई की मध्यमवर्गीय महिला में
क्या अंतर है
अपने जीवन के निर्णय
स्वयं लेने वाली उस बुढिया में
और
5000 साल की परम्परा को
निभाने के लिए दास बनी
मुंबई की मध्यमवर्गीय महिला में
क्या अंतर है
जीवन यापन की जरूरतों को
पूरा करते हुए
जल,जंगल का संवर्धन करती
उस आदिवासी बुढ़िया में
और
दूसरों की ज़मीन पर कब्जा कर
मेंग्रूवज को पाटकर दलदली ज़मीन पर बनी
अमेरिकी टाउनशिप के नामों से
नामांकित टावर्स में रहने वाली
मुंबई की मध्यमवर्गीय महिला में
क्या अंतर है
अपने शरीर पर चर्बी का लेस मात्र भी
नहीं रखने वाली उस आदिवासी बुढ़िया में
और
शौपिंग माल्स की मल्टीनेशनल
फ़ास्ट फ़ूड चेन के स्वाद से
सर से पाँव तक गोल गोल हुई
ट्रेडमिल पर चर्बी गलाती
मुंबई की मध्यमवर्गीय महिला में
क्या अंतर है
शुद्ध पानी हवा और भोजन से
अपनी मर्जी से बच्चों को जनने वाली
उस आदिवासी बुढ़िया में
और
वंश चलाने के लिए दान में लाई हुई
मुंबई की मध्यमवर्गीय महिला में
क्या अंतर है
अपने यौनिक स्वतंत्र अधिकार से
जीवन जीती उस आदिवासी बुढ़िया में
और
मंगल सूत्र के एवज में
पितृसत्तात्मक समाज में अपने
यौनिक स्वतंत्र अधिकार को
गिरवी रखने वाली
मुंबई की मध्यमवर्गीय महिला में
क्या अंतर है
खुले आंगन में रात को
पूरे चाँद को निहारती
उस आदिवासी बुढ़िया में
और
संस्कारों में अपने
अस्तित्व को दफ़न कर
टीवी में करवाचौथ का चाँद देखती
मुंबई की मध्यमवर्गीय महिला में
क्या अंतर है
सर्व अंग सम्पन्न
उस आदिवासी बुढ़िया में
और
बीपी और तमाम रोगों से ग्रसित
मुंबई की मध्यमवर्गीय महिला में
क्या अंतर है
अंतिम साँस तक बकरियां
चराने का प्रण लेने वाली
उस आदिवासी बुढ़िया में
और
बीमा कंपनियों के इन्शुरन्स के सहारे
या किसी वृद्धाआश्रम में अपनी
अंतिम सांस की प्रतीक्षारत
मुंबई की मध्यमवर्गीय महिला में
फिर भी
मुंबई देश की आर्थिक राजधानी है
बुढ़िया का गाँव गरीब है
मुंबई विकसित है
बुढ़िया का गाँव पिछड़ा है
मुंबई की मध्यमवर्गीय महिला
पढ़ी लिखी है
बकरी चराती आदिवासी
बुढ़िया अनपढ़ है !
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