सम्मोहन
-मंजुल भारद्वाज
एक व्यक्ति ने कहा
70 साल में कुछ नहीं हुआ
जनता ने तालियाँ बजाई
वाह वाह कर चिल्लाई
जनता भीड़ हो गई
श्मशान और कब्रिस्तान में
तकसीम हो गई
वो तख़्त नशीं हो गया
गांधी का सत्य
अम्बेडकर की समता
नेहरु का लोकतंत्र
सत्ता का पाखंड हो गए
तर्क और तर्कशीलता
दोनों खत्म हो गए
भक्त और भीड़ काबिज़ हो गए
विचार विकार हो गया
जुमला परवान चढ़ा
सम्मोहन काल
लोकतंत्र को लील रहा है
इस समय प्रगतिशील
विवेक सम्मत कवि
शायर,साहित्यकार
रंगकर्मी और कलाकार
मर चुके हैं,आज वो बाज़ार में
अपनी लाशें ढो रहे हैं!
...
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