रूहों का कहाँ बसेरा होता है!
- मंजुल भारद्वाज
हवाओं का कहाँ वतन होता है
चरागों का कहाँ मकां होता है
जिस्मों का घर होता हो
रूहों का कहाँ बसेरा होता है!
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‘डायरी के पन्नो से नाटक के मंच तक’ - मंजुल भारद्वाज डायरी के पन्ने जब हम पलटते हैं फुर्सत के पलों में तो यकायक रोमांचित हो उठते हैं ! खो...
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