कलात्मक रूहें !
....... मंजुल भारद्वाज
समाधान के शोध में ,
उछलती ,मचलती ,डूबती
भावनाओं की तड़पती बहती धारा ,
अपने तत्व की तलाश में
उलझता सुलझता मन
उष्णता ,शीतलता के बीच
झूमती, डोलती काया
अपने होने , ना होने के समर में
अंदर ,बाहर झांकते बिम्ब
चेतना के सूर्य का आत्मोदय
तत्व के यथार्थ को साधती
सिद्धहस्त करती सिद्धियाँ
अपने नाद को अनाहद में
परिवर्तित करती स्वरलहरियां
अपने कलात्मक सत्व को सुनती
गाती , गुनगुनाती कलात्मक रूहें !
...
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