कला
–मंजुलभारद्वाज
मोहक,आकर्षक,कशिश
अदा, इश्क, नुमाइश की
चाश्नी भर नहीं है ‘कला’
कागज़ या कैनवास पर
मादक जिश्मों को उकेरना
भर नहीं है ‘कला’
शब्दों के श्रुंगार और उनकी
मात्र लयबद्धता नहीं है ‘कला’
दमदार आवाज़ और उसकी
खनक भर नहीं है ‘कला’
जिस्मों के घर्षण का ‘चित्रीकरण’
भर नहीं है ‘कला’
किसी पत्थर या धातु को आकार
भर देना नहीं है ‘कला’
वाद्द यंत्रों को पीटना
भर नहीं है ‘कला’
ये ‘कला’ का अर्धसत्य है
ये ‘कला’ का अभिशाप है
जैसे ‘नरों व कुंजरों’ के
अर्धसत्य से अभिशप्त है ‘राजनीति’
वैसे ही अपने `अर्धसत्य’ से
अभिशप्त है ‘कला’
इस अर्धसत्य को
‘मानवीय होने के संकल्प’ की प्रतिबद्धता के
‘यथार्थ’ की भट्टी में तपा
पूर्ण ‘सत्य’ की खोज की निरन्तरता के
अहसास,अनुभूति और ‘उत्प्रेरणा’ का
नाम है ‘कला’
भावों की ‘विचारों’ से प्रगाड़
‘सृजन’,सम्मति का नाम है ‘कला’
जीवन के पहाड़ को उठाने का ‘हौंसला’ दें
संजीवनी को ‘पहचानने’ की ‘दृष्टि’ देने की
‘दृष्टि’ निर्माण प्रक्रिया का नाम है ‘कला’
पेट की आग और भौतिक सरोकारों को
‘समग्र’ चेतना की ‘लौ’ से
रोशन करने का नाम है ‘कला’
स्वाद , सौन्दर्य , रस,
भोग की चादर में लिपटे
मनुष्य को मनुष्य बनाने का
नाम है ‘कला’
...
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