रंगकर्म
-मंजुल भारद्वाज
रंगकर्म झूठ होते हुए सच है
जीवन सच होते हुए भी झूठ
सत्ता निष्पक्ष होते हुए पक्षपाती है
रंगकर्म पक्षधर होते हुए निष्पक्ष
सत्ता संवैधानिक होते हुए
चंद लोगों की हिरासत में है
रंगकर्म चंद सिरफिरों का
जुनून होते हुए उन्मुक्त
रंगकर्मियों सावधान
रंगकर्म झूठ है
झूठ में झूठ मिलाओगे
तो वो नुमाइश भर होगा
जनसरोकारों का पैरोकार नहीं
सत्ता के इशारों पर नाचता हुआ
गिरगिटी प्रवृति से लबरेज
जिस्मों का छद्म कर्म होगा
जीवन संघर्ष है
संघर्ष का हथियार रंगकर्म है
लालच जब जरूरतों को ढक ले
तो जीवन आडम्बरों के मुखौटे लगाता है
रंगकर्म मुखौटे उतार
जीवन को सच से रूबरू कराता है
जीवन सत से जन्मा रंगकर्म
सत्य की खोज का
कलात्मक स्वरूप है
स्व यानी आत्म
रूप यानी शरीर
अपने शरीर से बाहर
अपने अंदर देखने की
कला है रंगकर्म
झूठ का आभास लिए
सच का अहसास है रंगकर्म!
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