Friday, July 26, 2019

हाशिया हाशिये पर ना हो - मंजुल भारद्वाज

हाशिया हाशिये पर ना हो
- मंजुल भारद्वाज 
मजदूरों का यलगार हो 
धर्मान्धता,सामन्तवाद,पूंजीवाद 
शोषण,अन्याय,असमानता 
के खिलाफ़ ललकार हो!

पहाड़ तोड़ने वाले, 
जमीन जोतने वाले 
समुद्र का सीना चीरकर 
तूफानों को रोकने वालों का श्रम 
रोटी का मोहताज़ ना हो

दृष्टि स्पष्ट हो, सृष्टि का निर्माण हो 
अपनी लड़ाई किसी को ठेके पर 
देने की बजाय,
आत्म निर्माण का संकल्प हो!

इंकलाब का आगाज़ हो 
हर सपना साकार हो
सम्यक,समता,न्याय की पुकार हो
एक हाथ नर का दूजा हाथ नारी का
लिंग समानता उसका आधार हो !

ऐ विश्व के मजदूरों 
तुमने भाषा,क्षेत्र, 
देश और भेष को पाटा है 
वसुधैव कुटुम्बकम के नारों
संकल्पनाओं को साकार किया है !

तोडा है गुरुर सत्ताधीशों का 
बारम्बार,लाल लहराया है 
हर बार, लाल के लिए कुर्बान 
ऐ माटी की संतानों 
अब होशियार, सजग और सचेत
होकर पूछो उनसे ये सवाल 
‘मज़दूरों’ के नाम पर साम्राज्यवादियों से 
लड़ने वाले खुद ‘साम्राज्यवादी’ कैसे हो गए! 
ताकि हाशिया हाशिये पर ना रहे!

हर ज़ोर ज़ुल्म की टक्कर में संघर्ष 
हमारा नारा है 
लड़ेगें, जीतेगें की भीड़ में 
ढ़ोनेवाले,ढकेलने वाले 
नारा लगाने वाले जिस्म 
की छवि को बदलना होगा 
सत्ता को उखाड़ फ़ेंकने वाले 
क्रांतिकारियों को ‘आत्म’ में झांकना होगा 
व्यवस्थागत क्रांति के साथ 
आत्म क्रांति करनी होगी 
चिंतन,विचार,स्वराज का 
आत्मोदीप जलाना होगा 
ताकि हाशिया हाशिये पर ना रहे!...

#सलाम #मज़दूरदिवस #मंजुलभारद्वाज

Tuesday, July 23, 2019

चाँद -मंजुल भारद्वाज

चाँद 
-मंजुल भारद्वाज
 
दिलरुबा है चाँद 
सनम है चाँद 
सुकून है चाँद 
तन्हाई है चाँद 
मिलन का साक्षी
जुदाई का गवाह है चाँद 
वफ़ा की चादर 
बेवफ़ाई का दामन है चाँद 
दिलों का अरमा 
कशिश है चाँद 
कहीं आग लगाता है चाँद
कहीं प्यास बुझाता है चाँद
कहीं वनवास
कहीं ईद है चाँद 
हुस्न,जमाल,खूबसूरती 
का पैमाना है चाँद
कलाओं का कारीगर 
सौन्दर्य का शास्त्र है चाँद 
सियाह रात के सूनेपन में, 
रौशनी का सबब है चाँद
आशिकों का राजदार,साथीदार,
उनकी ख़ामोशी का गुन्हेगार है चाँद 
सूर्य की वसुंधरा पर 
परछाई है चाँद 
मेरे भीतर, मेरे सूर्य का 
आत्म प्रकाश है चाँद 
एक बुद्ध के आत्म ज्ञान का 
प्रकाश और साक्ष्य है चाँद!...

#चाँद #बुद्ध #मंजुलभारद्वाज

कविता - मंजुल भारद्वाज

कविता
- मंजुल भारद्वाज


विचार प्रवृति , विचार प्रकृति 
अपने दृष्टि आलोक के 
शब्दों पुष्पों को 
भावनाओं के आँचल में 
करीने से सजाकर 
एक गुलदस्ता बनाती है 
जिसको हम ‘कविता’ कहते हैं !
...
#कविता’ #मंजुलभारद्वाज

अपने तल और तलहटियों में झांकिए ! - मंजुल भारद्वाज

अपने तल और तलहटियों में झांकिए !
- मंजुल भारद्वाज 
जल में मल है 
गंध है, दुर्गन्ध है 
नफ़रत है, हिकारत है 
वैमनस्य है,जहर है 
आज समाज की तलहटी में

मानवीय मूल्यों का तल 
ढका है कीचड़,लालच 
क्रूरता,हत्या और फ़रेब से

आँखों में प्रेम नदी का तल 
सरस्वती की तरह विलुप्त है 
गंगाजमुनी तहजीब अभिशप्त है

दुर्योधन,दुशासन,धृतराष्ट्र के युग में 
काल प्रतीक्षारत है किसी द्रौपदी के प्रण का 
तय होना है की धर्मयुद्ध आप स्वयं लडेंगें 
या अवतार का इंतज़ार करेगें!

अपने तल और तलहटियों में झांकिए 
क्या पता कोई कृष्ण 
गाय चराते हुए,अपनी बंसी पर 
प्रेमधुन बजा रहा हो! 
...
#तल #तलहटी #मूल्य #मंजुलभारद्वाज

तुम कौन हो! -मंजुल भारद्वाज

तुम कौन हो!
-मंजुल भारद्वाज 
तुम्हारे समर्पण पर 
मेरा सर्वस्व अर्पण 
एक जीवन,एक दर्पण 
एक मार्ग.एक मंज़िल
एक सफ़र.एक हमसफ़र 
एक तलाश,एक खोज
एक काल,एक कला 
एक पहर,एक सहर
एक स्थूल,एक सूक्ष्म 
एक आकार,एक निराकार 
एक अर्पण,एक समर्पण 
एक जूनून,दो मुसाफ़िर 
एक सृजक,एक सृजन
तुम कौन हो!...

#मंजुलभारद्वाज

ये गा गा है जीवन का -मंजुल भारद्वाज

ये गा गा है जीवन का
-मंजुल भारद्वाज 


ये गा गा है जीवन का 
उसके अलग अलग हिस्से हैं 
हर एक हिस्सा निराला है

एक हिस्सा बच्चों का है 
आँख है उसका आकार
जिसमें हैं जीवन के सपने अपार
मस्ती,कौतुहल,जिज्ञासा 
नादानी,शरारत,भोलापन 
रोना,हंसना,गाना,रूठना 
झुला,घसरपट्टी,सी-सॉ
उछलकूद, भागम भाग, पकड़ा पकड़ी 
अलग अलग आवाजों की किलबिलाहट
ढेर सारी माताएं,एक आध पिता
कहीं दादा दादी,नाना नानी 
पूरे अनुभव के साथ नाच रहे हैं 
इन मासूम बच्चों के इशारों पर 
पर ये अगाध,बेलाग उर्जा 
जीवन की लहर, उनकी बंदिशों के 
किनारे तोड़कर अपने हौंसले 
विश्वास को बढाती हुई 
अपनी आखों में जीवन लिए हुए

इस आँख के इर्दगिर्द हैं पगडण्डीयाँ 
जिस पर जीवन को नाप रहे हैं 
स्वस्थ शरीर का सपना लिए जिस्म 
आधे जागे, आधे सोये 
आधे इधर उधर झांकते हुए 
आधे अपने कानों में इयरफ़ोन 
लगाए नाप रहे हैं जीवन यात्रा

बीच बीच में जीवन को 
समझते,बुझते,प्रौढ
अपने चिंतन मनन से 
देश दुनिया को बदलने 
सपना और रणनीति पर 
चर्चा,बहस और संवाद करते हुए

एक सन्तूर के पास 
गोल बैठा महिला समूह 
बिल्कुल सन्तूर की तरह 
हंसता,खिलखिलाता हुआ 
टूटी शहनाई के पास बैठा समूह 
अपनी यादों को जोड़ता हुआ

बेंचों पर विराजमान बुजर्ग 
अपने जीवन सार को टटोलता हुआ 
उन्हीं के पास चटक पीले फूलों से लदा वृक्ष 
जीवन में बसंती रंग भरता हुआ

एक बेरी के पेड़ वाले कट्टे पर 
अधेड़ उम्र की ग्रहणियों का जमघट 
किसी पनघट की याद दिलाता हुआ 
अलग अलग घर की रसोई 
और जीवन दासता सुनाता हुआ

किसी कोने में अतृप्त,अभिशप्त 
कामुक, कुंठाग्रस्त विडंबनाओं का डेरा है 
उन पर सचेत निगाहों का पहरा है

तो कहीं नवा नवा शबाब 
अपने इश्क की दास्ताँ
लिख रहा है चोरी चोरी
कहीं पूरे आत्मविश्वास से 
जीवन बसाने का मजमून 
लिख रहा है कोई

हाँ मैं हूँ यहाँ 
ऊँगली पकड़े यादों की 
अपनी बेटियों के सवालों
मस्ती,भागदौड़,उनके 
गिरने,उठने,खेलने वाले 
विविध रंगों के साथ 
जी हाँ ये जीवन का गा गा है 
जीवन के समस्त रंग समेटे हुए !



#गागा #बगीचा #जीवन #मंजुलभारद्वाज

ये बेटियों की चीख है! - मंजुल भारद्वाज

ये बेटियों की चीख है!
-मंजुल भारद्वाज 
दर्द की हद है 
सब्र की इन्तहा 
ऐ जुमलेबाज़ जान लें 
ये तेरे जुल्मो सितम की हद है 
कैसे नींद आती है ऐ पाखंडी 
बेटियों की चीखों में कैसे 
चैन से सोता है 
कैसे तेरी रूह नहीं कांपती 
कैसे तेरी आत्मा नहीं जागती 
बक बक करने वाले लफ्फाजी
कैसे बेटियों की आबरू के लिए 
तेरी जुबां नहीं खुलती 
सुन ऐ तानाशाह 
बेटियों की हाय खरतनाक होती है 
अच्छे अच्छे तख़्तनशीनों को खाक 
में मिलाती है 
भुला नही होगा निर्भया की चीख 
जिसका नाम लेकर वोट माँगा था 
वो ‘निर्भया’ की चीख थी जिसने 
सत्ताधीशों को बाहर कर दिया 
ऐ तख़्तनशीन शेखीबाज़
सुन चारो ओर बेटियाँ लहूलुहान हैं 
तेरे भक्त बेटियों को नोच रहे हैं 
और तू खामोश है !
सम्भवतः ये ख़ामोशी तेरा ‘अंत’ है!
ये बेटियों की चीख है!
...
#बेटियाँ #मंजुलभारद्वाज

‘डायरी के पन्नो से नाटक के मंच तक’ - मंजुल भारद्वाज

 ‘डायरी के पन्नो से नाटक के मंच तक’ - मंजुल भारद्वाज डायरी के पन्ने जब हम पलटते हैं  फुर्सत के पलों में  तो यकायक रोमांचित हो उठते हैं !  खो...