Saturday, March 11, 2023

ज्ञान और जीवन लक्ष्य के , काल कोण से निर्धारित होती है परछाई! -मंजुल भारद्वाज

 ज्ञान और जीवन लक्ष्य के , काल कोण से निर्धारित होती है परछाई!

-मंजुल भारद्वाज 



अपनी परछाई से 
मुक्त होना चाहता है 
व्यक्ति,समूह,समाज
हो नहीं पाता 
ताउम्र अपने तमस से 
द्वंद्व कर संसार त्याग 
शरीर छोड़ देता है 
परछाई से मुक्त नहीं होता 
परछाई का प्रकाश से 
अटूट संबंध है 
प्रकाश से संचालित 
होती है परछाई 
प्रकाश यानी ज्ञान 
छाया यानी तम
तमसो मा ज्योतिर्गमय
जीवन का मूल है 
वसुंधरा का प्राण है जीवन 
वसुंधरा सूर्य की परिक्रमा करती है 
सूर्य ज्ञान का स्त्रोत 
ज्ञान मनुष्य को अँधेरे से 
मुक्त करता है 
वसुंधरा के आंगन में 
मनुष्य की परछाई 
सूर्य और वसुंधरा के 
काल कक्ष कोण से 
निर्धारित होती है 
सूर्य सर पर हो 
तो परछाई पैरों के 
तले होती है 
नियंत्रित या विलुप्त होती है
सूर्य और वसुंधरा के 
काल कक्ष कोण की भांति 
मनुष्य का ज्ञान और जीवन लक्ष्य 
जीवन के उजाले-अँधेरे 
तय करते हैं 
ज्ञान का काल कोण
जीवन के लक्ष्य को 
संचालित करे तो 
जीवन कल्याणकारी 
परछाई यानी तम
मुक्त होता है!

Friday, March 10, 2023

अहिंसा मानवता का मुक्ति सूत्र है! -मंजुल भारद्वाज

 अहिंसा मानवता का मुक्ति सूत्र है!

-मंजुल भारद्वाज 
अहिंसा मानवता का मुक्ति सूत्र है!  -मंजुल भारद्वाज




एक हिन्दू राजा था 
कुंठा और हिंसा से लिप्त 
प्रतिशोध की अग्नि में जलता हुआ 
दिन रात तलवार की नोंक से 
अपना आधिपत्य स्थापित करते हुए
मनुष्यों के रक्त से स्नान करता हुआ 
वो युद्ध का उपासक था
एक युद्ध की विभीषका ने 
उसे झकझोर दिया 
उसका विवेक जागा
कलिंग की भूमि ने 
उस हिंसक राजा को 
बुद्ध की शरण में भेज दिया 
राजा ने अहिंसा को अपनाया 
और वो राजा 
दुनिया का चक्रवर्ती सम्राट कहलाया 
बुद्ध के उस अनुयायी ने 
राजनीति को जनकल्याण के 
रूप में प्रस्थापित किया 
सत्ता को न्याय का तख्त बनाया 
मानव के साथ पशु प्राणियों के 
अधिकार को सुनिश्चित किया 
आज भी उसका चक्र 
भारत के तिरंगे की शान है 
उसका चिन्ह 
भारतीय शासन की आन है 
वो है अहिंसा का अनुयायी 
सम्राट अशोक !

सत्ता के विधाता का नाम है आम आदमी! -मंजुल भारद्वाज

 सत्ता के विधाता का नाम है आम आदमी!

-मंजुल भारद्वाज 
सत्ता के विधाता का नाम है आम आदमी!  -मंजुल भारद्वाज


बेचारगी का भाव 
अजर अमर करने वाला 
लाचारी सोने पे सुहागा 
गिडगिडाने में सिद्धहस्त
धर्म का खेवनहार 
है आम आदमी !
इसी आम आदमी को
बेबसी,गरीबी और शोषण चक्र से मुक्त कराने के लिए
अमोघ सत्ता सूत्र से 
अपने को दृष्टा,सृष्टा 
राजनीति के राजसूत्र बताने वाले 
सर्वहारा के मार्क्स
अंतिम व्यक्ति की मुक्ति के महात्मा 
जन्म के संयोग से अभिशप्त 
जनता के मूकनायक आंबेडकर ने
अपने जीवन की आहुति दे दी और
स्वाहा हो गए 
पर यह आम आदमी 
अत्याचार,हिंसा,अन्याय की चादर में 
सत्ता का केंद्र बनकर 
कुम्भकर्ण के निंद्रायोग में समाधिस्त है !
सदाचारी विवेक में तपने वाले 
स्वघोषित आम आदमी के उद्धारक
क्या 
मनुष्य होने की सार्थकता से भागते 
पेट भरने को जीवन का मकसद 
मानने वाले इस आप आदमी के 
सत्ता मन्त्र को जान पाए? 
घाघ है यह आम आदमी 
पेट भरने के सुख के लिए
न्याय,अहिंसा,समता,विवेक का 
हर पल सौदा करता है !
दुनिया का सबसे बड़ा 
अवसरवादी है यह आम आदमी 
अच्छे अच्छे विचारक,सत्ताधीश 
इसके चक्रव्यहू में घूमते रहते हैं 
पर भेद नहीं पाते !
यह आम आदमी पेट भरने के मोक्ष से 
कोई समझौता नहीं करता 
सत्ता बनती हैं 
मिट जाती हैं 
इस आम आदमी के सत्ता सूत्र
बेबसी,गरीबी,शोषण 
आदिकाल से आज तक कायम हैं 
पेट भरता रहे बस 
राजतन्त्र,तानाशाही,लोकतंत्र से 
उसे कोई मतलब नहीं 
नीति,विधान,संविधान से 
कोई सरोकार नहीं 
पेट भरने की दरकार है !
यह आम आदमी ही है 
सत्ता का विधाता 
जो डांट डपट,दमन 
तोप,टैंक,अणुबम से नहीं 
बेचारगी,बेबसी और लाचारी से 
घूमाता है सत्ता का चक्र 
जिसमें पिसकर चले जाते हैं 
अंतिम व्यक्ति के महात्मा
सर्वहारा के मसीहा 
जन्म संयोग के मुक्तिदाता
कायम रहती है 
आम आदमी की भूखी भीड़ 
विवेक,विधि,विधान को बेचकर
मनुष्य होने की सार्थकता से 
भागती अवसरवादी भीड़
इस भीड़ का नाम है 
आम आदमी! 

Thursday, March 9, 2023

मनुष्य होने की सार्थकता - मंजुल भारद्वाज

 मनुष्य होने की सार्थकता

- मंजुल भारद्वाज

मनुष्य होने की सार्थकता  - मंजुल भारद्वाज


तुम्हारी हद जहां ख़तम होती है
वहां से मेरा क्षितिज शुरू होता है 
तुम यथार्थ का समंदर हो
मैं कल्पनाओं का आसमान 
हदों के पार पलती हैं उम्मीद
जिससे जन्म लेते हैं ख़्वाब 
मंथन होता है यथार्थ के भ्रम का
जड़ता के विष को निष्क्रिय करता हुआ
उभरता है चैतन्य का 
अमृत तुल्य क्षितिज
जहां बसता है हमारा विश्व 
इंसानियत के सुंदर सपनों से सजा 
मनुष्य होने की सार्थकता को
सिद्ध करता हुआ!

Monday, March 6, 2023

यह भारत है ! -मंजुल भारद्वाज

 यह भारत है !

-मंजुल भारद्वाज 
यह भारत है !  -मंजुल भारद्वाज


संविधान के मुखौटे लगाए 
हिन्दू,मुस्लिम,सिख,इसाई
अपने मुखौटे उतार लो 
अब जान लो,पहचान लो 
यह भारत है,भारत 
हिन्दू,मुस्लिम,सिख,इसाई
या अन्य किसी धर्म के 
मानने वालों का देश नहीं 
यह भारतीयों का भारत है
जो भी इसे हिन्दू और मुसलमान का 
देश बनायेगा 
वो संविधान के साथ गद्दारी करता है 
भारत के साथ गद्दारी करता है 
आपके हिन्दू होने को 
मुसलमान होने को कोई 
ब्लैकमेल ना कर पाए 
आपकी धार्मिक भावनाओं का 
सत्ता के लिए दुरूपयोग ना कर पाए 
इसलिए संविधान है 
आपकी धार्मिक पाकीज़गी को 
सम्मानित करते हुए 
सबका मान सम्मान रखते हुए 
पर आप भावावेग में 
हर बार संविधान की अवहेलना करते हो 
अपने व्यक्तिगत धर्म के उन्माद में 
संविधान सम्मत प्रशासनिक 
दायरे को लांघ जाते हो 
व्यक्तिगत और सार्वजनिक 
दायरों के फ़र्क को समझिये 
हिन्दू,मुस्लिम,सिख,इसाई
होने के पहले भारतीय बनिये 
भारत भारतीयों का है 
किसी विशेष धर्म का नहीं !

Wednesday, March 1, 2023

कौन हैं वैज्ञानिक ? - मंजुल भारद्वाज

कौन हैं वैज्ञानिक ?
- मंजुल भारद्वाज

कौन हैं वैज्ञानिक ? - मंजुल भारद्वाज


लाशों पर जो जश्न मनाता है
वही महाशक्ति है
मनुष्यों को 
मानवता को एक पल में
ज़मीदोज कर दे 
वही विज्ञान का अभिशाप है
आग के गोलों से झुलसते
देश को देख 
जो जश्न मनाते हैं
वही शांतिदूत के नोबेल पुरस्कार से नवाजे जाते हैं !
सभ्यता एक खोखला शब्द बनकर
मिसाइल के धमाकों का शोर बन जाता है
कौन हैं अल्फ्रेड नोबेल ?
डायनामाइट का आविष्कारक!
दुनिया को बारूद पर बिठा
शांति का पुरस्कार बांटता है !
क्या अल्बर्ट आइंस्टीन को इल्म नहीं था
रूजवेल्ट उसके सूत्र से परमाणु बॉम्ब बना
इंसानियत को पिघला कर 
सदा सदा के लिए खत्म कर देगा !
कौन हैं यह वैज्ञानिक?
क्या है विज्ञान ?
क्या यह दुनिया के शत्रु नहीं है?
आज इन्हीं की वजह से 
दुनिया तबाह है !
क्या है आधुनिकता?
अगर यह आधुनिकता है
तो पाषाण युग क्या है?

लोग चाहते हैं ! -मंजुल भारद्वाज

लोग चाहते हैं !

-मंजुल भारद्वाज
लोग चाहते हैं !  -मंजुल भारद्वाज


लोगों को पसंद है 
अंधाधुंध इस कथन पर चलना
धंधेबाज के लिए फायदेमंद 
और विवेकशील लोगों के लिए 
आत्मघाती होता है !
आज देश में यही हो रहा है
धंधेबाज अदानी और झूठश्री मोदी 
लोगों की पसंद हैं पर सवार हो
देश बेचकर मुनाफ़ा कमा रहे हैं !
विवेक के पैरोकार पस्त हैं 
भीड़ के आगे घुटने टेके हुए हैं 
झूठ को सच मान 
लोग यही चाहते हैं के आगे 
बेबस और लाचार हैं !
बुलडोज़र न्याय का प्रतीक है 
न्यायपालिका सो रही है 
न्यायधीशों ने न्याय देवी की 
आँखों पर बंधी पट्टी को 
अपनी आँखों पर बांध लिया है
लोगों की पसंद वाली सत्ता ने 
संविधान को सलीब पर टांग दिया है !
लोकतंत्र के पैरोकार पत्रकार
मालिक को पत्रकारिता का 
खेवनहार और मसीहा समझ रहे हैं 
मालिक नहीं छापता हमारी ख़बर 
तो क्या करें का रोना रो रहे हैं 
बच्चों की दुहाई दे
मालिक के लिए मुनाफ़ा कमाकर 
अपना पेट पाल रहे हैं 
विकारी संघ लोकतंत्र को भीड़तन्त्र बना रहा है !
क्या भारत हर पल झूठ बोलने वाले 
प्रधानमंत्री के लायक है?
क्या स्वतंत्रता के लिए 
अपना बलिदान देने वाले सेनानियों ने 
ऐसे ही भारतवासियों की कल्पना की थी 
जो अपना पेट पालने के लिए 
अपने लोकतंत्र को नीलाम कर दें !
ओ बच्चों की दुहाई देने वालो 
सोचो, सत्य के साथ खड़े हो 
आज नहीं बोले 
तो कल नहीं बचेगा 
तब आपकी संतानें क्या करेंगी !

‘डायरी के पन्नो से नाटक के मंच तक’ - मंजुल भारद्वाज

 ‘डायरी के पन्नो से नाटक के मंच तक’ - मंजुल भारद्वाज डायरी के पन्ने जब हम पलटते हैं  फुर्सत के पलों में  तो यकायक रोमांचित हो उठते हैं !  खो...