Friday, November 1, 2019

ज़िंदगी के गुलिस्तां में ..... मंजुल भारद्वाज

ज़िंदगी के गुलिस्तां में
..... मंजुल भारद्वाज
ज़िंदगी के गुलिस्तां में
अनायास कोई एक लम्हा
छलक उठता है
मचल उठता है
महक उठता है
अपनी तमाम यादों के साथ
जी उठता है , सजग हो उठता है
सराबोर कर देता है
सुस्त पड़ी ज़िंदगी को
अपनी तारो ताज़गी से
... ज़िंदगी के गुलिस्तां में
ताज़गी के स्नान से
हूक उठती है
ज़िंदगी को नए सिरे और
संकल्पों के साथ जीने की
... ज़िंदगी के गुलिस्तां में

#ज़िंदगी #गुलिस्तां #मंजुलभारद्वाज

सकारात्मक तरंगों के घेरे - मंजुल भारद्वाज

सकारात्मक तरंगों के घेरे
- मंजुल भारद्वाज
विेखंडित दिशाहीन तरंगों को
सकारात्मक घेरों में प्रवाहित कर
प्रतिध्वनि को गुंजायमान किया
प्रतिध्वनि के नाद से
अहसास का स्पंदन सम्प्रेषित हुआ
मैं कौन,कहाँ,कब हूँ
कहाँ होऊंगा का चित्र
मस्तिष्क में विचरण होने लगा
जाग्रत होती चैतन्य अवस्था ने
हुँकार भरी
हम हैं!
#सकारात्मक #तरंग #मंजुलभारद्वाज

साहिल - मंजुल भारद्वाज

साहिल
- मंजुल भारद्वाज
जवां होती तन्हाई ने
सागर की लहरों पर अंगड़ाई ली
आवेग,बैचेनी ,प्यास
साहिल को पाने की
लहर दर लहर उठती रही
लहरों और साहिल के दरम्यान
फ़ासला ज्यादा नहीं होता
दरकार है तो बस
अटूट,अदम्य हौंसले की!
#मंजुलभारद्वाज #साहिल

'समय' का सृजन - मंजुल भारद्वाज

'समय' का सृजन
-मंजुल भारद्वाज
जिज्ञासा के वेग पर
कहे,अनकहे की लहरों पर
सृजनात्मक नाव में
विविध रंगों का परचम फहराते हुए
हम निकलें हैं ज्ञान के समंदर में
तराशते हुए अपनी कला को
'समय' का सृजन करने के लिए!
#मंजुलभारद्वाज #समय #सृजन

जिजीविषा -मंजुल भारद्वाज

जिजीविषा
-मंजुल भारद्वाज
जिजीविषा
जीने की हूक
सार का अर्थ सार्थक
सार्थक होने का सबब
कल्पनाओं का उड़ान भरना
मन,प्रतिज्ञा और कर्म
एक दिशा और उर्जा
तालमेल और कर्मठता
सृजनात्मक उर्जा का
नए आसमान का भ्रमण कर
साकार होकर धरा पर लौटना
अस्तित्व का दीपस्तम्भ
आत्मप्रकाश से पीढ़ियों को
प्रकाशित करता हुआ एक गीत
खूबसूरत है जिंदगी...
#जिजीविषा #खूबसूरतहैजिंदगी #मंजुलभारद्वाज

कुम्हार - मंजुल भारद्वाज

कुम्हार
- मंजुल भारद्वाज
अपने आप को हर पल मथता हुआ
हर पल बनाकर
हर पल विखंडित करता हुआ
रचना प्रकिया की सहजता से
विचार,भावना,शरीर और अध्यात्म के सिरों को
काल की कसौटी पर परखता हुआ
इंसानियत की वेदना,संवेदना को
देह की माटी में
आत्मबोध के साक्षात्कार से
घड़ी में घट घड़ता हुआ
कुम्हार ही तो ब्रह्म है!
....
#सृजक #कुम्हार #मंजुलभारद्वाज

पूर्व – पश्चिम - मंजुल भारद्वाज

पूर्व – पश्चिम
- मंजुल भारद्वाज
पूर्व ‘समग्र’
पश्चिम ‘व्यक्तिवाद’
पूर्व ‘ज़रूरत’
पश्चिम ‘लालच’
पूर्व ‘त्याग’
पश्चिम ‘भोग’
पूर्व ‘योग – विश्व कल्याण’
पश्चिम ‘बाज़ार – विश्व शोषण’
पूर्व ‘मैं में समग्र’
पश्चिम ‘समग्र में मैं’
....
#सभ्यता #बाज़ार #मंजुलभारद्वाज

‘डायरी के पन्नो से नाटक के मंच तक’ - मंजुल भारद्वाज

 ‘डायरी के पन्नो से नाटक के मंच तक’ - मंजुल भारद्वाज डायरी के पन्ने जब हम पलटते हैं  फुर्सत के पलों में  तो यकायक रोमांचित हो उठते हैं !  खो...