Sunday, August 31, 2025

घने कोहरे में ! -मंजुल भारद्वाज

 घने कोहरे में !

-मंजुल भारद्वाज


घने कोहरे में

पसीजता मन

भिगो देता है

सारे जंगल को !


मोहब्बत की निशानियाँ

चमकती हैं

डाल डाल

पत्ती पत्ती

ओस की बूंद बनकर !


महबूब के नूर से

जगमगाती है कायनात

इंसानियत का पैगाम लिए

खिलता.महकता है गुलशन

पर्वतों से गिरते झरनों में

प्रेम धुन बजाते हुए !

घने कोहरे में ! -मंजुल भारद्वाज  घने कोहरे में पसीजता मन भिगो देता है सारे जंगल को !  मोहब्बत की निशानियाँ चमकती हैं डाल डाल पत्ती पत्ती ओस की बूंद बनकर !  महबूब के नूर से जगमगाती है कायनात इंसानियत का पैगाम लिए खिलता.महकता है गुलशन पर्वतों से गिरते झरनों में प्रेम धुन बजाते हुए !



Thursday, August 28, 2025

मूर्त ..अमूर्त के अन्तरिक्ष में -मंजुल भारद्वाज


मूर्त ..अमूर्त के अन्तरिक्ष में

-मंजुल भारद्वाज 


अलिप्त होकर 

जब मैं देखता हूँ  

तब पता चलता है 

मुझे अपने मुक्त होते उन्मुक्त में 

किसी की तलाश है  

इस भाव विश्व में 

एक आस – आभास का संकेत होता है 

संदेश होता है 

मैं अपनी ही राह  

देखता रहता हूँ 

एक स्थूल  ‘मैं’ 

अपने अमूर्त ‘मैं’ की तलाश में निरंतर

मूर्त ..अमूर्त के अन्तरिक्ष में रहता हूँ 

यही मेरा भ्रमण पथ 

सृजन पथ 

यही  मेरा सृजन कक्ष है 

यही मेरा सृजन स्थल है

जहाँ सहज निर्झर बहती है 

मेरी सृजन धारा ! 

मूर्त ..अमूर्त के अन्तरिक्ष में -मंजुल भारद्वाज  अलिप्त होकर  जब मैं देखता हूँ   तब पता चलता है  मुझे अपने मुक्त होते उन्मुक्त में  किसी की तलाश है   इस भाव विश्व में  एक आस – आभास का संकेत होता है  संदेश होता है  मैं अपनी ही राह   देखता रहता हूँ  एक स्थूल  ‘मैं’  अपने अमूर्त ‘मैं’ की तलाश में निरंतर मूर्त ..अमूर्त के अन्तरिक्ष में रहता हूँ  यही मेरा भ्रमण पथ  सृजन पथ  यही  मेरा सृजन कक्ष है  यही मेरा सृजन स्थल है जहाँ सहज निर्झर बहती है  मेरी सृजन धारा !  #मूर्त #अमूर्त #मंजुलभारद्वाज

#मूर्त #अमूर्त #मंजुलभारद्वाज

Monday, August 18, 2025

अर्थ खोजता हुआ ! -मंजुल भारद्वाज

अर्थ खोजता हुआ!

-मंजुल भारद्वाज 


संवेदनाओं के समंदर में 

एक तूफ़ान उठा है  

अपने को समूल मथता हुआ 

व्यक्तित्व की तलहटी 

प्रतिष्ठा की सतह को झकझोरता हुआ 

आक्रोश और विवशता को फेंटता हुआ 

मूल्यों के अर्थहीन सफ़र

अर्थ के मूल्य युग की मूर्छा में 

लिपटे समाज की मवाद,गाद से 

निकलने के लिए छटपटाता हुआ 

सत्ता के बाहुपाश में जकड़े

मनुष्यता,इंसानियत,रिश्ते 

प्यार,दोस्ती,ईमान की  

मुक्ति का मार्ग खोजता हुआ

एक तूफ़ान अपने भंवर में है 

स्वयं के होने का 

अर्थ खोजता हुआ!

...

अर्थ खोजता हुआ! -मंजुल भारद्वाज   संवेदनाओं के समंदर में  एक तूफ़ान उठा है   अपने को समूल मथता हुआ  व्यक्तित्व की तलहटी  प्रतिष्ठा की सतह को झकझोरता हुआ  आक्रोश और विवशता को फेंटता हुआ  मूल्यों के अर्थहीन सफ़र अर्थ के मूल्य युग की मूर्छा में  लिपटे समाज की मवाद,गाद से  निकलने के लिए छटपटाता हुआ  सत्ता के बाहुपाश में जकड़े मनुष्यता,इंसानियत,रिश्ते  प्यार,दोस्ती,ईमान की   मुक्ति का मार्ग खोजता हुआ एक तूफ़ान अपने भंवर में है  स्वयं के होने का  अर्थ खोजता हुआ! ... #संवेदना #अर्थ #मंजुलभारद्वाज




#संवेदना #अर्थ #मंजुलभारद्वाज


Saturday, August 16, 2025

बापू तुम्हें क्या मिला? -मंजुल भारद्वाज

 बापू तुम्हें क्या मिला?

-मंजुल भारद्वाज 

बापू तुम्हें क्या मिला? 

सत्य के प्रयोग से 

सूट बूट पहनने वाले बैरिस्टर को

लंगोटी में नंगे घूमना पड़ा 

क्या मिला अहिंसा से?

गोली से उड़ा दिए गए 

किन को आज़ाद कराया?

सत्य के प्रयोग

अहिंसा के मार्ग पर 

चलने वाले देश को?

नहीं बापू नहीं 

आपके राम हो गये  

जय श्रीराम !

सौम्य राम,मर्यादा पुरुषोत्तम राम नहीं 

अब जय श्रीराम का हिंसक रूप 

देश की रगों में दौड़ रहा है !

78 साल में देशवासियों ने 

तुम्हें गलत साबित कर दिया बापू 

सत्य,अहिंसा त्याग कर 

झूठ,दमन,हिंसा को अपना लिया !



बापू तुम्हें क्या मिला?  -मंजुल भारद्वाज

बापू आपको हर सांस 

हर पल जपने वाले झूठेश्वर सत्ताधीश ने 

साबित कर दिया 

आप गलत थे !

आज़ाद देश का नेता लंगोटी नहीं 

दस लाख का सूट पहनता है 

सत्य नहीं झूठ से सत्ता चलाता है !

सहमति,सहभागिता नहीं 

दमन से सत्ता चलाता है !

अहिंसा नहीं

हिंसा से देश चलता है 

यह सफ़ल प्रयोग 

झूठेश्वर सत्ताधीश ने कर दिखाया !

बापू आज पूरे देश में 

झूठेश्वर सत्ताधीश का जयकारा है !

बापू तुम्हें जवाब देना पड़ेगा 

सत्य,सद्भाव और अहिंसा की राह दिखाकर

क्यों देश को गुमराह किया?

....

#बापू #सत्य #अहिंसा  #मंजुलभारद्वाज

Thursday, August 14, 2025

आज़ादी की पुकार है! -मंजुल भारद्वाज

 आज़ादी की पुकार है !
-मंजुल भारद्वाज 

हे आज़ादी के पैरोकार 
अब हथकड़ियों का श्रृंगार करो !
सच बोलने वालो 
ज़हर पीने के लिए रहो तैयार !
संविधान के संरक्षकों
सत्ता का प्रतिरोध करो !
लोकतंत्र के रखवालो   
सड़क पर सिंहनाद हो  !
यह देश की पुकार है
रंग दे बसंती चोला 
गाते हुए नौजवानों  
अब क्रांति का आग़ाज़ हो !
आज़ादी कुर्बानी मांग रही है
भगत सिंह को याद करो 
इंक़लाब ज़िंदाबाद 
संघर्ष में हिंसा नहीं 
अहिंसा के पथ पर चलो !
गांधी को याद करो
सत्याग्रह करो 
सत्य की डगर पर चलो
यह आज़ादी की पुकार है 
सबका सरोकार है! 
#आज़ादी #मंजुलभारद्वाज






आम्ही आदिवासी – मंजुल भारद्वाज

  आम्ही आदिवासी – मंजुल भारद्वाज   आम्ही आदिवासी आदिवासी आदिवासी … देशाचे मूळ निवासी … आम्ही आदिवासी आदिवासी आदिवासी …   आम्ही ज...