हासिल
-मंजुल भारद्वाज
कतरा कतरा रिसता है
यादों का बादल
भीगता रहता है
मन का आसमान
पसीजता हुआ मन
माथे पर नमक सा
उभरता है
जीवन के हासिल को
खोजते हुए!
...
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‘डायरी के पन्नो से नाटक के मंच तक’ - मंजुल भारद्वाज डायरी के पन्ने जब हम पलटते हैं फुर्सत के पलों में तो यकायक रोमांचित हो उठते हैं ! खो...
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