Monday, November 4, 2019

हूक - मंजुल भारद्वाज

हूक
- मंजुल भारद्वाज
नाभि में एक हूक उठती है
रीढ़ से होती हुई सिरहन
मस्तिष्क में आ पसरती है
कब,कहाँ,क्यों
क्या घटता है?
नियति है? या
सृजन चुनौती
या
काल को गढ़ने की परीक्षा
विविध भावरंगों के भंवर में
घूमता मस्तिष्क
अपने किनारों को तलाशता हुआ!

#मंजुलभारद्वाज #काल #भाव #रंग

No comments:

Post a Comment

‘डायरी के पन्नो से नाटक के मंच तक’ - मंजुल भारद्वाज

 ‘डायरी के पन्नो से नाटक के मंच तक’ - मंजुल भारद्वाज डायरी के पन्ने जब हम पलटते हैं  फुर्सत के पलों में  तो यकायक रोमांचित हो उठते हैं !  खो...